रोजगार कहानी । Employment Stories

रोजगार



रामकिशन अपने छोटे-से झोपड़ीनुमा घर में उदास बैठा था. 15 दिन पहले लॉकडाउन होने पर तीन सौ किलोमीटर पैदल चल कर घर पहुंचा था. उस समय जेब में कुल साढ़े आठ हजार सौ रुपये थे. उसके घर पहुंचने पर उसकी पत्नी, दोनों बेटियां और बूढ़ी मां बेहद खुश हुईं. उसने आते ही कुछ दिनों के राशन का इंतजाम कर लिया था, पर अब लॉकडाउन बढ़ जाने से रामकिशन की चिंताएं बढ़ती जा रही थीं. पत्नी ने उसे हिम्मत बंधाते हुए कहा- 'क्यों न हम यहीं कोई छोटा-मोटा काम शुरू कर लें. दाल- रोटी का जुगाड़ तो हो ही जायेगा.'


पत्नी की बातें सुन कर रामकिशन की आंखों में चमक आ गयी. अपने गांव में रह कर काम करने से अच्छी तो कोई बात ही नहीं हो सकती. पर सवालयह था कि किया क्या जाये? दोनों ने खूब सोचा. फिर तय किया कि फिलहाल सरकार द्वारा लोगों को मास्क पहनने की हिदायत दी जा रही है, लेकिन हर किसी के पास मास्क उपलब्ध नहीं है, तो क्यों न कपड़े के मास्क बना कर उन्हें आसपास के गांवों और कस्बों में भेजा जाये. रामकिशन ने जल्दी ही अपनी पत्नी के साथ मिल कर यह काम शुरू करदिया.

 कपड़े की व्यवस्था और उसे सही आकार में काटने का काम रामकिशन करता था और उसकी पत्नी उसमें डोरियां लगा कर मजबूती से सिलाई करती थी. धीरे-धीरे लोग उनसे मास्क खरीदने लगे. कुछ और जरूरतमंद लोग भी इस रोजगार से जुड़ गये थे. अत्यंत उचित दरों पर मास्क की बिक्री करके वे लोग मशहूर हो गये थे. धीरे-धीरे इसने लघु उद्योग का रूप ले लिया. गांव में रह कर गांव में ही जीविकोपार्जन हेतु अब धीरे-धीरे समूह बनने लगे थे, जैसे कि साबुन उद्योग, अचार-पापड़ उद्योग, गलीचा व कारपेट उद्योग, रंगाई-छपाई उद्योग, मसात् उद्योग, आदि. देखते-ही देखते गांव के अन्य लोगों को भी रोशनी की किरण दिखने लगी थी. उन्होंने भी गांव

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